जय हिन्द, दोस्तों भूमिपुत्र इंडिया यूट्यूब चैनल पर आपका स्वागत है दोस्तों इस विडियो में हम पौधे के विकाश और व्यवस्थित वृध्दि के लिए आवश्यक मुख्य पोषक तत्वों में से NPK मतलब नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के बारे में जानेंगे वैसे ये बहुत अजीब बात है किसान फसल उत्पादन में सबसे ज्यादा इनका ही खाद के रूप में प्रयोग करता है फिर भी अधिकतर किसान इनके बारे में पूरी तरह से नहीं जानते है | मैं तो ये कहूँगा NPK को खेत की मिट्टी में इतना अधिक डाला है अधिक फसल उत्पादन के चक्कर में की मिट्टी की प्राकृतिक उपजाऊ छमता ही खत्म कर दी अब ये हमको मानना ही पड़ेगा इनके अधिक प्रयोग से खेत बंजर होने की स्थिति में पहुच गये है मतलब अधिकतर किसान तो ऐसा सोचतें है इनके प्रयोग के समय, की सिर्फ NPK से ही बम्पर फसल उत्पादन होगा और इसी कारण DAP , यूरिया खाद के बोरे पर बोरे खेत में डालते जाते है मैं आपसे एक बात पूछता हूँ आप किसी पहलवान को उसकी आवश्यकता से अधिक सिर्फ घी और बादाम जैसी चीजे ही खिलाओ, उसको हरी सब्ज्जियाँ और फल बिलकुल भी खाने को मत दो मैं मानता हूँ निश्चित ही पहलवान का स्वास्थ्य कुछ दिन में ही ख़राब हो जायेगा और वो कमजोर हो जायेगा जबकि आपके हिसाब से ऐसा नही होना चाहिए क्योकि आपने तो उनको ज्यादा एनर्जी और तेज वृध्दि देने वाली चीजे खाने को दी है वो उसकी खाने की छमता से अधिक लेकिन सच ये ही है जरुरत से ज्यादा हर चीज नुकसान करती है इस कारण किसान का सबसे बड़ा नुकसान होता है पहला ये पौधे को सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी हो जाती है क्योकि किसान अन्य किसी भी खाद का उपयोग ही नहीं करते है और दूसरा ये की NPK को आवश्यकता से अधिक देने के कारण किसान का पैसा बेवजह बर्बाद हो जाता है अगर NPK की मात्रा आवश्यकता से बहुत अधिक लग जाती है तो ये ही पैसा आपको बर्बाद करने लग जाता है इस लिए हो सके तो मिट्टी जाँच के बाद ही आवश्यक खाद का प्रयोग करें ये तो आप जानते ही है की प्रत्येक फसल को अलग अलग खाद की मात्रा की आवश्यकता होती है तो किसी नजदीकी मिट्टी जाँच केंद्र जांए मिट्टी जाँच कराये, इसके बाद जरुरत के हिसाब से फसल में खाद दें और कृषि विशेषज्ञ से सलाह जरुर लें जिससे आपको दो फायदे होंगे आपको फसल भी बम्पर प्राप्त होगी और लगत भी कम लगेगी कुल मिलाके दोगुना फायदा होगा दोस्तों अगर आपको मिट्टी जाँच कराने में समस्या आ रही है या आप पहले हुयी मिट्टी जाँच से संतुष्ट नहीं तो आप हमारे कृषि विशेषज्ञो से सलाह ले सकते है और अपने खेत के मिट्टी के सैंपल को हमारे अतिआधुनिक मिट्टी परिक्षण केंद्र भेज सकते है जिससे आपको मात्र एक दिन में ही आधुनिक टेक्नोलॉजी की मशीनों से मिट्टी जाँच प्राप्त होगी और मशीन ये भी बताएगी आपको आने वाली फसल में कितना खाद डालना है साथ ही हमारे फसल विशेषज्ञ भी आपकी मदद करेंगे अधिक जानकारी के लिए हमें कम्मेंट कर सकते है और हमसे जुड़ने के लीये हमरे चैनल को अभी सब्सक्राइब कर ले | तो चलिए NPK के बारे में जाने नाइट्रोजन – सबसे पहले बात करते है नाइट्रोजन के बारे में तो पौधे के तनों एवं शाखाओ के विकास हेतु इसकी आवश्कता होती है | नाइट्रोजन के प्रमुख कार्य है
1. पौधे में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भाग निभाता है | 2. पर्णहरित का निर्माण कर पौधे को गहरा हरा रंग प्रदान करता है | 3. पौधों की वृद्धि एवं विकास में योगदान देता है पौधे में नाइट्रोजन की कमी के लक्षण – पौधों की बढ़वार रूक जाना। पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं। निचली पत्तियाँ पहले पीली पड़ती है तथा नयी पत्तियाँ हरी बनी रहती हैं । नाईट्रोजन की अत्यधिक कमी से पौधों की पत्तियाँ भूरी होकर मर जाती हैं ।  नाइट्रोजन से जुडी कुछ जरुरी जानकारी पौधे को नाइट्रोजन की आवश्यक मात्रा के लिए यूरिया 2 – 3 बार में देना चाहिए क्योकि एक बार में पौधा पूर्णरूप से नाइट्रोजन नहीं ले पाता है और अधिक यूरिया एक साथ डालने पर पूरी नाइट्रोजन काम में नहीं आती है जितना पौधे को जरुरत होती है उस समय लेता है बाकि पानी के साथ जमीन में चली जाती है  एक सावधानी जरुर रखे फसल के पकने की अवस्था में नाइट्रोजन का प्रयोग नहीं करें अगर ऐसा करते है तो फसल हरी बनी रहती है और समय से नही पकती है | जबकि हमको लगता है फसल बहुत अच्छी होगी फास्फोरस – अब बात करते है फास्फोरस की तो बीज के अंकुरण के समय से ही फसल प्राप्ति तक पौधे का महत्वपूर्ण अंग जड़ होता है जो पौधे को मिट्टी के माध्यम से सम्पूर्ण पोषक तत्व उपलब्ध कराती है | इन्ही जड़ों के विकास में सबसे महत्वपूर्ण तत्व फास्फोरस होता है इसकी पर्याप्त मात्रा मिट्टी में होने पर ही जड़ों का संतुलित विकास होता है जिससे जड़ें पौधे तक पोषक तत्वों को पहुंचाती है फास्फोरस एक अचल पूषक तत्व है जिसको जहाँ डाला है ये वही पड़ा रहता है | इसकी उपलब्धता मिट्टी के pH मान पर निर्भर करती है फास्फोरस तत्त्व की अधिकांश मात्रा मिट्टी में जाकर एक जगह रूक जाती है जिस कारण वो पौधो को प्राप्त नही हो पाती है इस समस्या से बचने के लिए हमेशा फास्फोरस को बुवाई करते समय जड़ क्षेत्र में 2-3 इंच निचे तक देना चाहिए |  फास्फोरस के प्रमुख कार्य है –
1. . फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदा होता है 2. बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटरोधकता बढती है.
3. .फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा सुद्दढ़ होती हैं । 4. पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है ।
5. यह नाइट्रोजन के उपयोग में सहायक है 6. फलीदार पौधों में इसकी उपस्थिति से जड़ों की ग्रंथियों का विकास अच्छा होता है ।  फास्फोरस की कमी के लक्षण –
1. पौधो की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होता है कभी कभी तो सूख भी जाती है | 2. . अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना, फल व बीज का निर्माण सही न होना। 3. पौधे छोटे रह जाते है | दाल वाली फसलो में निचली पत्तियां नीले रंग की हो जाती है | 4. इसकी कमी से आलू की पत्तियाँ प्याले के आकार की तथा चौड़ी पत्ती वाले पौधे में पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है।. • एक जरुरी जानकारी फॉस्फोरस की कमी को दूर करने के लिए अम्लीय मिट्टी में रॉक फॉस्फेट का व्यवहार करें। रॉक फॉस्फेट से पौधों को धीरे-धीरे पूर्ण जीवनकाल तक फॉस्फोरस मिलता रहता है । पोटाश – पोटाश मुख्य पोषक श्रेणी में अंतिम पोषक तत्व है | पोटाश के प्रमुख कार्य –
1. पोटाश की सही मात्रा से फलों और अनाजों में चमक बनी रहती है | 2. फसलोत्पादन के समय जब पौधों में पुष्पन, फलन होता है तब मिट्टी में पोटाश की मात्रा का सही होना आवश्यक है| 3. पौधे को इस अवस्था में अच्छी मात्रा में पोटाश मिलने पर फूल और फल में अधिक वृद्धि होती है |
4. फसलो की गुणवत्ता में वृद्धि करता है । पोटाश की कमी के लक्षण –
1. पत्तियाँ भूरी व धब्बेदार हो जाती हैं तथा समय से पहले गिर जाती हैं। पत्तियों के किनारे व सिरे झुलसे दिखाई पड़ते हैं।
3. पत्तियों का नीचे की ओर लटक जाना । पत्तों का आकार छोटा होना । इसी कमी से मक्का के भुट्टे छोटे, नुकीले तथा किनारोंपर दाने कम पड़ते हैं। आलू में कन्द छोटे तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है  शर्करा तथा स्टार्च वाली फसलों जैसे गन्ना, आलू, केला आदि के लिये अधिक मात्रा में पोटाशियम की आवश्यकता होती है। अधिक उपज देने वाली धान तथा गेहूँ की फसल को भी पोटाशियम की अधिक आवश्यकता पड़ती है म्यूरेट ऑफ पोटाश, तम्बाकू, आलू, टमाटर तथा अंगूर आदि फसलों के लिये हानिकारक हो सकता है। इसलिये इन फसलों में पोटाशियम सल्फेट का प्रयोग करना चाहिये। परंतु धान जैसी पानी में खड़ी रहने वाली फसलों में पोटाशियम सल्फेट की बजाय म्यूरेट ऑफ पोटाश अच्छा रहता है। दोस्तों आज के लिए इतना ही अगर विडियो पसंद आया हो तो लाइक जरुर कर दें और इस जानकारी को अपनों तक पहुचने के लिए वाट्सअप से भी शेयर कर सकते है | इससे जुडी जानकरी के आप हमें कम्मेंट कर सकते है | तो मिलता हूँ इसी अगले विडियो तब तक के लिए स्वस्थ्य रहे , मस्त रहे | वंदेमातरम् |